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Tuesday, April 12, 2011

भूल गया हूँ अब तो,कि शक्ल भी याद नहीं
पर अब तक दिल में किसी और का नाम नहीं
आती है याद तेरी रह-रह कर
जैसे धडकनों को कोई और काम नहीं
वो मद्धम सा मुस्कुराना और वो झूठ-मूठ का गुस्सा दिखाना,
समझना मेरी हर बात को और मुझे हर बात समझाना,
वो लड़ना तेरा मुझसे और फिर मान जाना
बहुत याद आएगा मुझे तेरा ये याराना ..............
बयां से तेरे ऱाज ये आम हो गया,
चर्चा मेरी मुहब्बत का सरेआम हो गया.
सैकडों दीवाने मरते हैं तुझ पर,
फिजूल ही आशिकों में कत्लेआम हो गया.
दुश्वारियों का तोफहा मिला मुझे,
रुसवाई का रिसाला तेरे नाम हो गया.
कहते थे जुबां पे ना कभी आएगी दिल की बात,
इक आह निकली और,
सब कसमो वादों का काम तमाम हो गया.
आ ले चलू तुझे किसी और जहाँ में,
इस जहाँ से जाने का इंतजाम हो गया.

Monday, December 20, 2010

Par na kabhi maine kaha

Par na kabhi maine kaha


Shikwa uski baat ka na kabhi maine kiya 2
Bas ek yahi gila vo har baar karti h 2
Punchti rahi mujhse kyun raha bekhaber use
Kyun raha me bujha bujha har pal
Par na kabhi maine kaha


baata har gam usska ,na kabhi apna kaha
kyun kabhi usko apne gam ka ahsas bhi na maine diya
kyun raha parda hamesha na kabhi maine kaha
kyun raha parda hamesha na kabhi maine kaha
khikwa uski baat ka na kabhi maine kiya



punchti rahi vo mujhse mere dard-o-gam ka
par na kabhi maine kaha
suna aur hans diya
suna aur hans diya ,taal diya
par na kabhi maine kaha



vo punchti rahi hamesha
meri ankho me udte sawalo ka2
par sawalo tak ko, na kabhi maine kaha , na kabhi maine kaha
socha aur chod diya
socha aur chod diya usko tanha sawalo me
par na kabhi maine kaha

sikwa uski baat ka na kabhi maine kiya

Wednesday, August 18, 2010

एक लम्हा जाते -जाते कान में ये कह गया
अब न लौटेगा वो आंसू ,आंख से जो बह गया ।

कुछ तो माजी से मिले हैं और कुछ ताजे भी हैं
और भी एक ज़ख्म है जो भरते-भरते रह गया ।

गुनगुनाने के लिए छेड़ी जो मैंने एक ग़ज़ल
क्यूँ किसी की आंख से सारा समंदर बह गया ।

बुनियाद पक्की चाहिए ईमारत -ऐ-बुलंद को
एक मकां जो ताश का था बस हवा से ढह गया ।

वक्त की इस धूप ने मुझको बनाया सख्त जाँ
चोट गहरी थी मगर मैं मुस्कुरा के सह गया ।

Tuesday, July 6, 2010

यही हालात इब्तिदा से रहे
लोग हमसे खफा -खफा से रहे |

बेवफा तुम कभी न थे लेकिन
ये भी सच है कि बेवफा से रहे |

इन चरागों में तेल ही कम था
क्यों गिला फ़िर हमें हवा से रहे |

उसके बन्दों को देख कर कहिये
हमको उम्मीद क्या खुदा से रहे

जिंदगी की शराब मांगते हो
हम को देखो के पी के प्यासे रहे |

Thursday, March 11, 2010

ज़िंदगी तूने लहू लेके दिया कुछ भी नहीं

तेरे दामन में मेरे वास्ते क्या कुछ भी नहीं


मेरे इन हाथों की चाहो तो तलाशी ले लो

मेरे हाथों में लकीरों के सिवा कुछ भी नहीं